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Monday, April 19, 2010

BEST LITTLE STORIES

Sent by- Kunal Aggarwal
This Story is about a man who once upon a time was selling Hotdogs by the roadside.
He was illiterate, so he never read newspapers. He was hard of hearing, so he never listened to the radio.
His eyes were weak, so he never watched television. But enthusiastically, he sold lots of hotdogs.
He was smart enough to offer some attractive schemes to increase his sales. His sales and profit went up.
He ordered more and more raw material and buns and used to sell more. He recruited few more supporting staff to serve more customers. He started offering home deliveries. Eventually he got himself a bigger and better stove.
As his business was growing, the son, who had recently graduated from College, joined his father.
Then something strange happened.
The son asked, "Dad, aren't you aware of the great recession that is coming our way?" The father replied, "No, but tell me about it." The son said, "The international situation is terrible. The domestic situation is even worse. We should be prepared for the coming bad times.
" The man thought that since his son had been to college, read the papers, listened to the radio and watched TV. He ought to know and his advice should not be taken lightly. So the next day onwards, the father cut down on his raw material order and buns, took down the colorful signboard, removed all the special schemes he was offering to the customers and was no longer as enthusiastic.
He reduced his staff strength by giving layoffs. Very soon, fewer and fewer people bothered to stop at his hotdog stand. And his sales started coming down rapidly, same is the profit. The father said to his son, "Son, you were right".
"We are in the middle of a recession and crisis. I am glad you warned me ahead of time.
" Moral of the StoryIt's all in your MIND! And we actually FUEL this recession much more than we think"
By P R Krishnan

Sunday, March 15, 2009

ध्यान करिए और खुश रहिए


Contributed By - Sumit Aggarwal

मैं इन दिनों स्वामी बोधानंद लिखित पुस्तक ‘द गीता एंड मैनेजमेंट’ पढ़ रहा हूं। इसके अलावा पिछले सप्ताह मुंबई में मैंने ब्रह्मकुमारी द्वारा प्रस्तुत एक रूसी बैले के कार्यक्रम में हिस्सा भी लिया। इसी सप्ताह मेरी पत्नी श्री श्री रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग से जुड़े एक कार्यक्रम में भाग लेने गई। उक्त तीन अलग-अलग कार्यक्रमों में एक समानता सामने आई। कोई एक ऐसी चीज है, जो इन्हें आपस में जोड़ने का काम करती है।
किताब के मुताबिक ध्यान इस व्यस्त जिंदगी में किसी इंसान को शांतचित्त और रचनात्मक बने रहने में मदद करता है। हर रोज ध्यान करने वाले न सिर्फ अच्छा स्वास्थ्य हासिल करते हैं, बल्कि उनका दिमाग भी तेज चलता है। इससे भी महत्वपूर्ण उनके भीतर अपने आसपास के लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहने की इच्छी बलवती होती जाती है।
इस किताब में आगे बताया गया है कि नियमित ध्यान करने वाला कभी थकता भी नहीं है, हमेशा प्रेरित रहता है और लगातार किए जा रहे काम पर अपना फोकस बनाए रखता है। नियमित रूप से सुबह-शाम सिर्फ बीस मिनट ध्यान करने से ही अपेक्षित बदलाव आ सकते हैं। ब्रह्मकुमारी के कार्यक्रम में एक किस्से के जरिये बताया गया कि किस तरह हम अपने मन-मस्तिष्क पर बाहरी घटनाओं का प्रभाव पड़ने से रोक सकते हैं।
इसमें बताया गया कि नियमित रूप से कुछ घंटे राजयोग करने से खुशहाली हासिल की जा सकती है। दिन के चौबीस घंटे खुश रहना तो विद्यमान हालातों में संभव नहीं है, अत: राजयोग के जरिए पहले पहल कुछ घंटे खुशी हासिल कर सकते हैं। धीरे-धीरे यह अवधि बढ़ाई जा सकती है। वहां बताया गया कि अपने दिमाग पर नियंत्रण स्थापित कर और उसे दुनियावी बुराईयों की तरफ भटकने से रोककर हम ऐसा संभव कर सकते हैं।
चूंकि मेरी पत्नी श्री श्री रविशंकर के कार्यक्रम में भाग लेकर आई थीं, तो मैंने उनमें कई सकारात्मक बदलाव देखे। मैंने पाया कि अब वह हमारी किशोरवय बेटी को आसानी से संभाल सकती हैं।
जिन घरों में किशोरवय बच्चे होते हैं, वह इस बात को आसानी से समझ सकते हैं। फंडा यह है कि उक्त तीनों घटनाओं से पता चलता है कि नियमित ध्यान करने वाला कभी थकता नहीं है, हमेशा प्रेरित रहता है और वह पूर्णता का अहसास कर खुश भी रहता है। इसे एक बार करके देखने में क्या हर्ज है! आखिर इस कवायद से सिर्फ सकारात्मक चीजें ही तो मिलने वाली हैं, वह भी बगैर किसी साइड इफैक्ट के।


By - एन. रघुरामन



Wednesday, February 25, 2009

नेटवर्किग का होगा जमाना


Sent by- Purushottam Holani

ऑपरेटर: पिज्जा सेंटर फोन करने के लिए धन्यवाद। क्या मैं आपका...
ग्राहक: हैलो, क्या मैं अपना ऑर्डर...
ऑपरेटर: महोदय, क्या मैं पहले आपका मल्टीपरपस सिटीजन कार्ड नंबर जान सकती हूं?
ग्राहक: बिल्कुल, मेरा कार्ड नंबर है.. 88986135610204998-45-54610.
ऑपरेटर: अच्छा.. तो आप सिंह साहब हैं। आप मुझे 17, जालान हाउस से फोन कर रहे हैं। आपके घर का नंबर है 4094-2366, आपके ऑफिस का नंबर 76452302 और मोबाइल नंबर है 0142662566। वैसे फिलहाल आप किस नंबर से फोन कर रहे हैं?
ग्राहक: घर से, लेकिन आपको मेरे सारे नंबर कैसे मिले?
ऑपरेटर: महोदय, हम एक सिस्टम से जुड़े हुए हैं।
ग्राहक: क्या अब आप मेरा ऑर्डर लेंगी। सी-फूड पिज्जा...
ऑपरेटर: आपके लिए यह अच्छा नहीं रहेगा!
ग्राहक: क्यों?
ऑपरेटर: आपकी मेडिकल हिस्ट्री बताती है कि आप उच्च रक्तचाप के मरीज हैं। फिर आपका कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी बढ़ा रहता है!
ग्राहक: अच्छा.. तो आप क्या खाने की सलाह देती हैं?
ऑपरेटर: आप हमारा कम वसा युक्त हॉकिन मी पिज्जा खाएं। यह आपको जरूर पसंद आएगा।
ग्राहक: यह बात आप इतने निश्चित तौर पर कैसे कह सकती हैं?
ऑपरेटर: पिछले हफ्ते आपने नेशनल लाइब्रेरी से ‘लोकप्रिय हॉकिन व्यंजन’ किताब ली थी...
ग्राहक: हे भगवान.. चलिए आप तीन फैमिली साइज दे दीजिए। क्या कीमत हुई इसकी?
ऑपरेटर: आपके दस सदस्यों वाले परिवार के लिए ये बिल्कुल पर्याप्त रहेंगे। आपका बिल बना 4449.99 रुपए का।
ग्राहक: क्या बिल का भुगतान क्रेडिट कार्ड से चलेगा?
ऑपरेटर: माफी चाहूंगी, आपको नकद भुगतान करना होगा। आपकी क्रेडिट कार्ड लिमिट क्रॉस हो चुकी है। पिछले अक्टूबर से आप पर बैंक के 33,720 रुपए बाकी हैं। इसमें हाउसिंग लोन की किस्तों की देरी से किए गए भुगतान की लेट फीस शामिल नहीं है।
ग्राहक: मुझे लगता है कि जब तक आपका कर्मचारी पिज्जा लेकर आएगा, मैं नजदीक के एटीएम से कुछ पैसा निकाल लाता हूं!
ऑपरेटर: आप ऐसा भी नहीं कर पाएंगे। रिकार्ड बताता है कि आप एक दिन में निकाली जा सकने वाली रकम निकाल चुके हैं।
ग्राहक: कोई बात नहीं.. आप पिज्जा भेजिए, मैं नकद भुगतान तैयार रखूंगा। वैसे ऑर्डर डिलीवर होने में कितना वक्त लगेगा?
ऑपरेटर: लगभग 45 मिनट, लेकिन अगर आप इंतजार नहीं कर सकते हैं तो आप अपनी मोटरसाइकिल से आकर उसे ले सकते हैं।
ग्राहक: क्या!
ऑपरेटर: सिस्टम में दर्ज जानकारी के मुताबिक आपके पास एक मोटरसाइकिल भी है, जिसका रजिस्ट्रेशन नंबर 1123...
ग्राहक: ????
ऑपरेटर: कोई और सेवा है श्रीमान!
ग्राहक: जी नहीं.. क्या आप ऑर्डर के साथ मुफ्त मिलने वाली तीन कोल्ड ड्रिंक्स भी भेजेंगी?
ऑपरेटर: हमें खुशी होती, महोदय! लेकिन आपकी डॉक्टरी रिपोर्ट बताती है कि आप मधुमेह के मरीज हैं...
ग्राहक: तेरी तो...!
ऑपरेटर: महोदय, आप अपनी भाषा पर नियंत्रण रखें। क्या आप भूल गए कि 15 जुलाई 1987 को एक पुलिस वाले के खिलाफ अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करने के जुर्म में आपको दोषी पाया गया था!
ग्राहक: (बेहोश होकर गिर पड़ता है)
भले ही आज यह सब मजाक लग रहा है, लेकिन कल यह सच्चई हो सकती है। आप उन्नत तकनीक के आगे कुछ भी छिपाने में सक्षम नहीं होंगे। फंडा यह है कि हम आज से ही इसकी आदत डालनी शुरू कर दें। आने वाला कल नेटवर्किग का ही है।
by -एन. रघुरामन

Sunday, February 22, 2009

लोकप्रिय बनाता है शिष्टाचार

Sent by- Shruti Aggarwal

अगर मैं मुंबई में हूं तो ऑफिस से लौटते वक्त अपने दोस्त बलजीत परमार को हर रोज उनके घर ड्रॉप करता हूं। उनका घर जुहू में अमिताभ बच्चन के घर के बहुत करीब है। इस तरह मुझे यह अहसास होता है कि मैंने शहर में बढ़ते प्रदूषण के स्तर में कुछ कमी तो की।
हालांकि उन्हें ड्रॉप करने का सिर्फ यही एक कारण नहीं है। उन्हें जुहू की चांद सोसायटी पर उतारते वक्त मुझे कई बार अमिताभ बच्चन के दर्शन भी हो जाते हैं। कम से कम पांच में से तीन बार तो ऐसा होता ही है। चांद सोसायटी एक मध्य वर्ग सोसायटी है, जिसके ग्राउंड फ्लोर पर अमिताभ बच्चन की निजी सचिव रोजी सिंह भी रहती हैं। प्रत्येक रात नौ से दस के बीच अमिताभ बच्चन स्वयं कार से उन्हें घर छोड़ने आते हैं। वह तब तक बिल्डिंग के बाहर रुकते हैं, जब तक कि रोजी अपने घर में प्रवेश नहीं कर जाती।
रोजी, अमिताभ बच्चन की बेहद विश्वसनीय सहयोगी हैं और उनके साथ लंबे समय से हैं। यहां तक कि अमिताभ बच्चन का जब खराब दौर चल रहा था तब भी रोजी ने उनका साथ नहीं छोड़ा था। इससे मुझे वर्षो पूर्व कोलकाता की एक घटना याद आ गई। उस रात अमिताभ बच्चन ने वहां पार्टी दी थी। मैंने रात के लगभग दो बजे उन्हें अपनी एक साथी पत्रकार को रूम तक छोड़कर आते देखा। वह एक पंच सितारा होटल था और हम सभी पार्टी में मशगूल थे।
इस पर उस महिला पत्रकार ने अमिताभ बच्चन से पूछा कि पंच सितारा होटल के सुरक्षित माहौल में भी वह उन्हें कमरे तक छोड़ने क्यों आए हैं? इस पर उनका जवाब था, ‘यह सामान्य शिष्टाचार है। अगर आप मेजबान हैं तो रात हो जाने पर महिला अतिथि को छोड़ना आपकी जिम्मेदारी है।’ इससे मुझे उनसे जुड़ी एक और याद ताजा हो आई।
एक यात्रा के दौरान जिसमें महिला पत्रकारों की संख्या पुरुष पत्रकारों से ज्यादा थी, अमिताभ बच्चन ने अपने सुरक्षाकर्मियों के साथ उन्हें एक सुरक्षा घेरे में ले लिया था। संभवत: यही वजह है कि वह आज भी महिलाओं के चहेते बने हुए हैं। फंडा यह है कि शिष्टाचार के बल पर आप सभी से त्वरित सम्मान पाने के हकदार हो जाते हैं। यही नहीं, इससे लोकप्रियता में भी इजाफा होता है।


by- N . Raghuraman

जरूरत से ज्यादा की इच्छा न करें


Sent by : Shruti Aggarwl

* तीस वर्षीय राजू ने शेयर बाजार में निवेश के लिए 45 लाख रुपए से अधिक का कर्ज लिया और वह सारी रकम गंवा बैठा।

* युवा बैंकर देशमुख ने भी शेयर कारोबार के लिए 20 लाख रुपए से अधिक का कर्ज लिया। जैसे-जैसे बाजार गिरता गया, वैसे-वैसे उसका निवेश भी डूबता गया।
* पिछले वर्ष की शुरुआत में राघवेंद्र राय ने मुंबई के उपनगर खार में छह करोड़ रुपए की कीमत वाला आलीशान फ्लैट खरीदा। अब मंदी में उसकी नौकरी जाती रही और वह अपने सपनों के घर को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।


* अपने चरम के दिनों में फिलीपींस के अपदस्थ तानाशाह की पत्नी इमेल्डा माकरेस के पास 1400 जोड़ी महंगे जूते, 1000 हैंडबैग और लगभग 50 शानदार गाउन थे। यदि सत्यम के राजू विद्यमान धोखाधड़ी में न उलझे होते तो संभवत: संग्रह के मामले में वे इमेल्डा को कड़ी चुनौती पेश कर सकते थे। यदि इंफोर्समेंट विभाग के सूत्रों पर यकीन किया जाए तो राजू के संग्रह में 1000 डिजाइनर सूट, 300 जोड़ी महंगे जूते और इतनी ही संख्या में ब्रांडेड बेल्ट मौजूद हैं। यही नहीं, दुनिया के 63 देशों में उनके आलीशान घर भी मौजूद हैं। भला कोई शख्स कैसे अलग-अलग देशों में अपने लिए आवास बना सकता है। क्या राजू जैसे व्यस्त रहने वाले शख्स के लिए संभव था कि वे 10 वर्ष में भी एक बार इन घरों में रहने जाते?

हमारे समाज में सैकड़ों ऐसे लोग रहे हैं, जिन्होंने आलीशान जिंदगी व्यतीत की। कुछ तो आज भी भव्य जिंदगी जी रहे हैं। इस स्तंभ में यह कहना तो उपयुक्त नहीं होगा कि उनकी यह भव्य जीवनशैली सही है या गलत। इतना जरूर कहा जा सकता है कि फैशन और तड़क-भड़क के प्रति उनकी दीवानगी ने आवश्यकता से अधिक सहेजने की प्रवृत्ति को हवा दी। जाहिर है इसी वजह से उनका पतन हुआ या उन्होंने नकारात्मक विकास का सहारा लिया।

विकास के क्रम में बहुत तेज गति से ऊपर जाने वाली चीज निश्चित तौर पर नीचे गिरती है। कुछ के लिए यह बेहद दुखदायी होता है। इससे यह फंडा सीखा जा सकता है किसी नई चीज की खरीद या और विकास के पहले अपनी स्थिति को सुदृढ़ करते जाएं। इसके बाद ही किसी दूसरी वस्तु की खरीद या प्रसार पर विचार करें। अगर आप बगैर मजबूती के लगातार बढ़ते जाएंगे, तो दुखदायी पतन की संभावना बढ़ जाती है।

अगर आप स्थायित्व देते हुए आगे बढ़ेंगे, तो पतन उतना दुखदायी नहीं होगा। आप एक बेडरूम फ्लैट से तीन बेडरूम फ्लैट खरीद सकते हैं, लेकिन यदि आप एक बेडरूम फ्लैट से सीधे नौ बेडरूम फ्लैट को खरीदते हैं तो निश्चित तौर पर सबकुछ सही नहीं है। इस क्रम में प्रकृति ही न्याय करती है। उसका अपना समय होता है, लेकिन भुगतना जरूर पड़ता है।

(लेख की शुरुआत में उल्लेखित उदाहरण सत्य हैं, परंतु पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं।)

by N. Raghuraman